बिदाई



दो अलग अलग व्यक्ति, एक से दोनों के खयाल
मिले दोनों ... दिल मिले, बना लिया परिवार.

शुरू हुआ सिलसिला, बड़ा विश्वास ... बड़ा दोनों में प्यार
देख इसी प्यार को, खुश हो, दिया भगवन ने वरदान
नौ महीने सीचा जिसको, खिल ही गया आखीर वो फूल
देखकर इसकी मासूम मुस्कान, दूर हो गयी माँ की हर थकान

पल बीते ... बीते दिन,
माता पिता जान गए ना जी पाते इसके बिन
थामकर पिता की ऊँगली चलने लगी आँगन में
थककर सो गयी कभी माँ के आँचल में

मासूम थी, नादान थी
पर रिश्तों की इसको पहचान थी
कभी झगडती थी, कभी रूठ जाती थी
पर हमेशा अपने भाई से प्यार करती थी

घर के आँगन में खेलती, भागती थी कभी तितलियों के पीछे
बसाकर नैनो में कल के सपने, बिखेरती हर तरफ अपना प्यार
एक मुस्कराहट से उसकी, खिल जाता घर संसार

बचपन बीता आया योवन, बढता गया सपनो का आँगन
पिता के कंधे तक आ पहुंची, होने लगी ख्वाइशें ऊँची
महफ़िल की शान थी, पर तन्हाइयां परेशान थी
था जाने कैसा खुमार, उसको था शायद किसी अजनबी का इन्तेज़ार.

बढती गयी चंचलता, मन में आने लगे विविध खयाल
एक तरफ था माँ से बिलगता बचपन, एक तरफ था भविष्य का खयाल

आया वो दिन जब दिखी दिल के आयने में एक परछाई
जिसने उसको प्यार की परिभाषा सिखलाई
बाबुल की गालियाँ न छोड़ने की बातें
बन गयी जाने कैसे साजन से मुलाकातें

बात बड़ी, रिश्ता बना
दोनों ने मिलकर ख्वाब बुना
बाबुल ने दी दुआएं , ममता ने आंसू छलकाए
एक आँख में खुशी, दुसरे में गम
जाने कैसी है ये बिदाई की रसम.

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