देखा है मैंने...


देखा है मैंने अक्सर ख़्वाबों को टूटते हुए
बीखरे अरमानो के टुकड़े आँखों में चुभते हुए
उम्मीद की लौ को तिलमिलाकर बुझते हुए
देखा है मैंने अक्सर हाथों से रेत फिसलते हुए

उम्मीद के सूरज को गम के समंदर में डूबते हुए
देखा है मैंने अक्सर सब्र को पिघलते हुए
एक साथी की खोज में किसी को मिलो चलते हुए
देखा है मैंने अक्सर मुहोबत को रुसवा होते हुए

फिर एक दिन -
देखा मैंने बचपन को मुस्कुराते हुए
अपनी आखों के नमक को हंसकर चखते हुए
माँ की गोद में चैन की नींद सोते हुए
ममता के आँचल में देखा मैंने मासूमियत को पलते हुए

Books by Arti Honrao

Depression is REAL

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