सफर



शरीर से रूह तक का सफर कितना लंबा और तनहा हो सकता है
ये पहले कभी सोचा न था
देख रही थी अब तक आईने में अपने शरीर को
कभी झांककर रूह में देखा न था

रोज मिटते रहते हैं इस दिल की भट्टी में
जाने कितने अधूरे अरमान
के अब तो गिनना भी छोड दिया है
वैसे तो नहीं आदत झूठी दुनिया में रहने की
पर अब सच्चाई से मुह मोड लिया है
खोयी रहती हूँ आपने ही ख्यालों में
खुद को खुश रखना चाहती हूँ
देखती हूँ जब भी अपना अक्स
सोचती हूँ, "क्या मैं यही देखना चाहती हूँ?"
तनहा सा ये एक शरीर जिसकी कोई परछाई भी नहीं
देखता है मुझे जैसे मैं कोई और हूँ, उसका अक्स नहीं

चलती हूँ रास्तों पर, कभी रास्ते चलते नज़र आते हैं
कभी रहती हू खड़ी पेड का आसरा लेकर
तो कभी बैठ जाती हूँ हारकर
नोचती हूँ जमीन पे उगी घास को
काश ऐसे ही जिंदगी से गम को उखाड पाती
आज भी जब सोचती हूँ इसका कोई हल मैं ढूंड नहीं पाती

बस suffer कर रही हूँ
इस शरीर से रूह तक के सफर में
मिले जो भी रहगुज़र
निकल गए आगे
मैं देखती रह गयी अपने आप को
जिंदगी के आईने में.





3 ways

Three ways to stay tuned to the updates on Straight from the Heart
  1. Like and follow the Facebook Page
  2. Download and Install SFTH+ App: Android | iOS (free and NO ads)
  3. Subscribe to whatsapp broadcasts (send me a whatsapp message and I will reply with instructions)