मुझे ज़िंदगी में
उस मक़ाम पे पहुँचा दे खुदा
के जहाँ से देखो तो किसी का ग़म ना दिखे
के जहाँ पर रहू तो कुछ महसूस ना हो
मुझे भी ज़िंदगी में
उस मक़ाम पे पहुँचा दे ख़ुदा
के जहाँ जाकर मैं दुनियादारी सीख जाऊँ
के जहाँ से लौटकर मैं भी औरों की तरह बन जाऊँ
मुझे भी ज़िंदगी में
उस मक़ाम पे पहुँचा दे ख़ुदा
के जहाँ पहुँचकर कहीं और जाने का मन ना करे
अगर खो जाऊँ मैं धुन में कहीं
तो मुझे मेरी ही पहचान ना रहे
मुझे भी ज़िंदगी में
उस मक़ाम पे पहुँचा दे ख़ुदा
के जिस ओर भी चलू तेरे ही ओर बड़े कदम मेरे
दुनिया देखकर ऊब जाऊँ तो तेरे घर का दरवाज़ा नज़र आए
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