शरीर से रूह तक का सफर कितना लंबा और तन्हा हो सकता है
यह पहले कभी सोचा न था
देख रही थी अब तक आईने में अपने शरीर को
कभी झाँक-कर रूह में देखा न था
रोज़ मिटते रहते हैं इस दिल की भट्टी में
जाने कितने अधूरे अरमान
कि अब तो गिनना भी छोड़ दिया है
वैसे तो नहीं आदत झूठी दुनिया में रहने की
पर अब सच्चाई से मुंह मोड़ लिया है
खोई रहती हूँ अपने ही ख्यालों में
खुद को खुश रखना चाहती हूँ
देखती हूँ जब अपना अक्स
सोचती हूँ, "क्या मैं यही देखना चाहती हूँ?"
तन्हा-सा यह एक शरीर जिसकी कोई परछाई भी नहीं
देखता है मुझे जैसे मैं कोई और हूँ, उसका अक्स नहीं
चलती हूँ रास्तों पर, कभी रास्ते चलते नज़र आते हैं
कभी रहती हूँ खड़ी पेड़ का आसरा लेकर
तो कभी बैठ जाती हूँ हारकर
नोचती रहती हूँ ज़मीन पे उगी घास को
काश ऐसे ही ज़िंदगी से गम को उखाड़ पाती
आज भी जब सोचती हूँ इसका कोई हल नहीं ढूँढ नहीं पाती
बस suffer कर रही हूँ
इस शरीर से रूह तक के सफर में
मिले जो भी रहगुज़र
निकल गए आगे
मैं देखती रह गई अपने आप को
ज़िंदगी के आईने में।
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