ज़िंदगी


दूसरे के ग़म पर क्या रोए कोई 
जब ख़ुद के ग़म पर रोने का वक्त नहीं...
किस किस के दिल पर मरहम लगाये कोई 
यहाँ हर किसिका दिल है ज़ख़्मों से भरा हुआ. 

आँखों में अधूरे ख़्वाब है कई 
मन में कई उम्मीदें बुझी हुई
क्या सवारेगा कोई दूसरे की ज़िंदगी 
जब ख़ुद की हो बिखरी हुई. 

बंद मुट्ठी में ख़्वाब संजोए थे कई 
आज हर किसी की मुट्ठी है खुली हुई 
उन आँखों में कभी झाँककर देखो 
जिन ज़िंदा आँखों से हो ज़िन्दगी ख़फ़ा हुई. 

वक्त के पीछे भागते हैं सारे 
राहों पर कुचले जाते हैं अरमान कई 
कोई तो रोको, कभी तो रोको उन दौड़ते कदमों को 
देखो कैसे पैरो के नीचे मुस्कुराहटें कई है कुचली गई.



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