खामोशी


रात की खामोशी में, सुबह के इंतज़ार में
दो पल गुजारती हूँ मैं अपने अन्तर्मन् के साथ
सुनती हूँ कभी उसकी आवाज़ को,
कभी बहुत कुछ कहती हूँ उससे.

एक मैं और एक वोह,
दोनों मिलकर फिर ज़िन्दगी की गुत्तियाँ सुलझाने की कोशिश करते हैं
हार जाते हैं कभी, कभी थक कर बैठ जाते हैं
मगर फिर जोश से खड़े होकर आगे बड़ते हैं, मुस्कुराते हैं

खामोश रात भी फिर साथ देती है
थके हुए तन को हलके से छु जाती है,
अच्छा लगता है तब, जान में जान आ जाती है
ज़िन्दगी हसीं हो जाती है

Books by Arti Honrao

Depression is REAL

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