खामोशी



रात की खामोशी में, सुबह के इंतज़ार में 
दो पाल गुज़रती हूँ मैं अपने अंतर्मन के साथ 
सुनती हूँ कभी उसकी आवाज़ को 
कभी बहुत कुछ कहती हूँ उससे 

एक मैं और एक वो 
दोनों मिलकर फिर ज़िंदगी की गुत्तियाँ सुलझाने की कोशिश करते हैं 
हार जाते हैं कभी, कभी थक कर बैठ जाते हैं 
मगर फिर जोश से खड़े होकर आगे बढ़ते हैं, मुस्कुराते हैं.

खामोश रात भी फिर साथ देती है 
थके हुए तन को हलके से छु जाती है, 
अच्छा लगता है तब, जान में जान आ जाती है 
ज़िन्दगी हसीं हो जाती है




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