ख्वाब


कुछ ख्वाब जले थे आँखों में
दिल से आज भी धुआ निकलता है
न आँखों को नींद
न दिल को सुकून मिलता हैं

रोज़ सोचती हूँ
नींद में फिर से नए ख्वाब सजाऊँगी
कुछ पल मुस्कुराकर
गम को भुलाउंगी
तकीया भीग जाता है आंसुओं से
नींद मगर आती नहीं
रोज़ सुनती हूँ ध्यान लगाकर
ख़ुशी की आहात मगर आती नहीं

थक गयी हूँ जागकर
अब सोना चाहती हूँ ...
सब कुछ भूलाकर
सपनो में खोना चाहती हूँ

कोई तो सुला तो मुझे...
ज़िन्दगी से मिला दो मुझे.

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