पुराने ख़त


जो लिखे थे कभी
क्लास में बैठकर
दिल के अरमान पेन से
कागज़ पे उतारकर
आज वोह ख़त मिलते हैं कभी कभी
उन पुरानी किताबों में

पुराने ख़त, पुराने जज़्बात
पुराने दिन, पुराने हालात
अनकही मुहोब्बत, अनसुनी इल्तजा
आँखों में वोह अन्चाल्के आंसू
लबों पे आकर रुके हुए वोह अनकहे अल्फाज़
आज भी महक आती है उन् खतों से
सुनाई देती है धडकनों की आवाज़

चीखते हैं, पुकारते हैं मुझे
कहते हैं उठाओ हमें और दे दो
उसेह, जिसका नाम है छिपा हर अल्फाज़ में
जिसकी एक आवाज़ सुनने के लिए
तरस जाते थे कान
जिसके करीब से गुज़रते ही
साँसे थम-सी जाती थी
जिसकी महक आती है आज भी यादों से

लेकर उन् खतों को हाथों में
चूमकर लबों से, लगाकर सीने से
कहती हूँ -
अब बहुत देर हो चुकी है.

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