चाहता हूँ ( चाहती हूँ इस कविता के उत्तर में)


तेरे सपनो को जानता था मैं पहले से
अब तेरे सपनो को सच करना चाहता हूँ
यूँ तो बहुत कुछ कहना है
पर बिना कहे तुम समझ जाओ ये चाहता हूँ

तकदीर ने खेले ऐसे खेल
तेरे करीब होके भी चुप रहा
अब बात निकल ही गयी है
तो इकरार करना चाहता हूँ

तेरी आँखों में रोज़ देखता था
अब तेरी आँखों में खो जाना चाहता हूँ
तेरे पास बैठता था पहले भी
अब तुझे महसूस करना चाहता हूँ
सिर्फ नाम के लिए सो रहा था अब तक
नींद कहाँ थी आँखों में
अब तेरी आँखों में देखते देखते
चैन की नींद सोना चाहता हूँ.

रोज़ उठता हूँ अलार्म की आवाज़ सुनकर
अब "अजी सुनते हो?" की आवाज़ सुनकर उठाना चाहता हूँ
वैसे तो मैं किसी को हक जताने नहीं देता
पर तेरे प्यार के सामने सर झुकाना चाहता हूँ.




चाहती हूँ इस कविता के उत्तर में

Books by Arti Honrao

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