चाहती हूँ


तुझे जो छूकर निकले वो फिज़ा बनना चाहती हूँ
तेरे दिल में उतरकर तेरी धड़कन बनना चाहती हूँ
जीने को बहुत जी लिया तन्हा
अब तेरे साथ जीना चाहती हूँ

एक सड़क की तरह हमेशा तेरे साथ चलना चाहती हूँ
तेरे मन में उतरकर मचलना चाहती हूँ
देख लिया चुप रहकर
अब चीख चीख कर राज़ बताना चाहती हूँ

तुझे जो जगाये वो सुबह बनना चाहती हूँ
तुझे सुलाने वाली रात बनना चाहती हूँ
तेरे इंतज़ार में बहुत वक़्त बिताया
अब तेरी बाहों में उम्र बिताना चाहती हूँ

छोटी - छोटी बातों पे तुझसे रूठना चाहती हूँ
तू गर रूठ जाए तो तुझे मनाना चाहती हूँ
सपनो में बहुत चाहा
अब हकीकत में तेरी बनकर हक जताना चाहती हूँ

इस कविता के उत्तर में लिखी गयी "चाहता हूँ" भी पढ़िए

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