तुम्हारे सपनों को जानता था मैं पहले से ही
अब मैं तुम्हारे सपनों को सच करना चाहता हूँ
यूं तो बहुत कुछ कहना है
पर बिना कहे तुम समझ जाओ, ये चाहता हूँ
किस्मत ने खेले ऐसे खेल
तुम्हारे करीब होकर भी चुप रहा
अब जब बात निकल ही गई है
तो इकरार करना चाहता हूँ
मैं रोज तुम्हारी आँखों में देखता था
अब तुम्हारी आँखों में खो जाना चाहता हूँ
मैं पहले भी तुम्हारे पास बैठता था
अब तुम्हें महसूस करना चाहता हूँ
अब तक तो सिर्फ नाम के लिए सो रहा था
नींद कहाँ थी आँखों में
अब तुम्हारी आँखों में देखते-देखते
सुकून की नींद सोना चाहता हूँ
रोज़ अलार्म की आवाज़ सुनकर उठता हूँ
अब "अजी सुनते हो" की आवाज़ सुनकर उठना चाहता हूँ
वैसे तो मैं किसी को हक जताने नहीं देता
पर तेरे प्यार के सामने सिर झुकाना चाहता हूँ।
In reply to चाहती हूँ,
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